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Nadi Ki Pratiksha Mein

Poetry

Nadi Ki Pratiksha Mein

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यह काव्य प्रकृति के उन मौन संवादों को सुनने का एक प्रयास है, जिन्हें मनुष्य अपनी भटकनों में धीरे-धीरे खोता चला गया है। यहाँ पर्वत प्रतीक्षा करते हैं, झरने एकांत के गीत गाते हैं, और नदी केवल जल नहीं एक ऐसी चेतना बन जाती है जो जन्म से विलय तक स्वयं की खोज में प्रवाहित रहती है। यह पुस्तक उत्तर नहीं देती, बल्कि उन प्रश्नों के निकट ले जाती है जो मनुष्य ने अपने भीतर बहुत समय से मौन कर रखे हैं। कौन हवाओं को दिशा देता है? कौन नदियों को बहाता है? और कौन हमारी श्वासों के भीतर अब भी मौन होकर प्रवाहित है? “नदीकी प्रतीक्षा में” उसी अदृश्य चेतना की एक काव्यमयी खोज है।
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