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Moksh/Mukti (Kya Sach Mein)?

Selfhelp

Moksh/Mukti (Kya Sach Mein)?

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यह किताब किसी धर्म विशेष के ऊपर टिप्पणी देने के लिए लेखिका ने नहीं लिखी है । इस किताब में लेखिका आज के युग में फैली हुई नकरात्मकता को उजागर करती है। जो कि मानसिक रूप से अधिक है। आज होने वाले गुनाह मानसिक कमजोरियों या पुरातन काल से चलती आ रही रूदीवादी परंपराओं का एक खतरनाक नतीजा हैं। यह किताब केवल उन पर कई अहम प्रश्न उठाती है। इस किताब में कुल पाँच (गंगा जल, गुलामी, अंधा विश्वास, स्त्री, प्रेम या मोह) पाठ हैं, जिसमे अलग अलग तरीके से प्रचलित मुक्ति की आलोचना कर सही अर्थों में मुक्ति के बारे में बताने की कोशिश लेखिका ने की है। इसके पीछे वेदों का पठन शामिल है। जिससे यह सारे विचार लिखने की प्रेरणा लेखिका को मिली है। लेखिका के इस किताब को लिखने का मनोरथ केवल इतना है कि हम अपने मन से सही रास्ता अपनाएँ और वेदों की शिक्षा को उचित रूप से समझने का कार्य अपने जीवन में करें। किसी के भावों को आहत करने की यहाँ कोई कोशिश नहीं की गई है। न ही ऐसी कोई लेखिका की मानसिकता है। लिखी गई बातें हमारे आज से मेल खाती हैं। ये बातें मानव समाज के लिए हैं । क्योंकि हम सब अलग अलग तरीकों से जीवन बाद में जीते हैं जिन्हे लोकभाषा में अलग अलग धर्म कहा जाता है, वरन पहले मानव बनकर इस धरती पर आते हैं।
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