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Kavyanjali Vol - 4

Poetry

Kavyanjali Vol - 4

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चतुर्थ संस्करण और अधिक दार्शनिक तथा वैज्ञानिक चेतना से ओत-प्रोत है। जहाँ ‘गुलामी की बेड़ियाँ’, ‘भोज, भाव और थाली’ सामाजिक विसंगतियों पर चोट करती हैं, वहीं ‘आँसुओं का गणितशास्त्र’ यह समझाता है कि आंसुओं के भी प्रकार होते हैं-वे कब खट्टे, कब मीठे और कब फीके हो जाते हैं। ‘मौन रिश्तों की डगर’ और ‘फिर यह कैसी रात आई’ जैसी रचनाएँ पारिवारिक ताने-बाने की टूटन को दर्शाती हैं। वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण का समन्वय करते हुए ‘चेतना का चंद्र चक्र’ मानव जाति पर चंद्रमा के प्रभाव को बताती है, तो ‘चुंबक के अनुसार देह धरा’ यह वैज्ञानिक रूप से समझाती है कि हमारे उठने-बैठने और सोने का तरीका प्रकृति के नियमों से कैसे जुड़ा है। इसके अतिरिक्त, ‘अमावस्याः आलसी विश्राम का दिवस’ के माध्यम से हमारे सनातन धर्म में विश्राम के दिनों के वैज्ञानिक महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है। जब मनुष्य जीवन के थपेड़ों से थक जाता है, तब उसे ‘गुरु की शरण’ और ‘माटी की महिमा’ ही संबल देती है, जिसका दिग्दर्शन ‘बद्री विशाल की कठिन डगर’ जैसी रचनाओं में होता है।
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