Do Panktiyon Ka Sansaar

299.00

नित- नूतन भाव, मुझे लिखने प्रेरित करते हैं। प्रकृति मेरी प्रेरणास्रोत है। प्रकृति के अद्भुत रमणीय- बिम्ब मुझे पुलकित करते हैं; प्रेम से सराबोर प्रकृति का प्रत्येक उपादान आनन्दित करता है, प्रेरित करता है। प्रकृति प्रेममयी है; प्रकृति की जिन प्रेम-अनुभूतियों को अनुभूत करती हूँ वही मेरी कविता, ग़ज़ल, गीत, छंदों में अभिव्यक्त होता है। प्रकृति में लय है, रागात्मकता है इसी से समरस हो कर, एकाकार होकर, मैं स्वयम प्रकृति हूँ अनुभूत करती हूँ तब उन्हीं अनुभूतियों को छंद-बद्ध कर, शब्दों के मोती चुन कर गूंथ देती हूँ। और फिर स्वर-बद्ध कर गुनगुनाती हूँ तब लगता है कि महादेवी वर्मा की पंक्ति “बीन भी हूँ मैं, तुम्हारी रागिनी भी हूँ” इन्हीं अनुभूतियों की देन रही होगी।

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